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बाबूशाही और राजभाषा कार्यान्वयन

विदेशी शासकों (अंग्रेजों) से आजाद होने के चौहत्तर वर्षों बाद भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए इतनी जुगत, इतनी तिकड़म करनी पड़ती है कि अचरज होता है। माना कि अंग्रेज लंबे समय हमारे देश में मालिक बन कर रहे और इस दरम्यान हम पर अपनी भाषा थोपने की कामयाब साज़िश कर गये, पर अंग्रेज मालिकोंContinue reading “बाबूशाही और राजभाषा कार्यान्वयन”

फेसबुकिया पसंदगी- नापसंदगी

सबसे पहले तो पसंदगी-नापसंदगी व्यक्ति, वस्तु या स्थान से प्रत्यक्षतः होती ही नहीं, होती है तो कर्ता के मन में बनी उसकी तस्वीर से। जाहिर है कि कोई तस्वीर सबके लिए प्रशंसनीय ही हो, आवश्यक नहीं, एक के लिए जो अच्छी है वह कईयों के लिए कम अच्छी या थोड़ा-ज्यादा बुरी भी हो सकती है।Continue reading “फेसबुकिया पसंदगी- नापसंदगी”

काम पूजा है; पूजा काम नहीं

हम हिन्दुस्तानी, चाहे हिंदू हों, मुस्लिम, सिक्ख या पारसी- दुनिया के किसी भी देश के लोगों से ज्यादा समय धार्मिक कर्मकांडों में बिताते हैं। “सात वार और नौ त्यौहार” कहावत ऐसे ही थोड़ा ही न है! धार्मिक अवकाश (घोषित) के दिन, रोज के प्रार्थना/नमाज़/अरदास आदि, सत्संग, प्रवचन, कीर्तन- भजन आदि मैं बिताए घंटे, इन सबकाContinue reading “काम पूजा है; पूजा काम नहीं”

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