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फेसबुकिया पसंदगी- नापसंदगी

सबसे पहले तो पसंदगी-नापसंदगी व्यक्ति, वस्तु या स्थान से प्रत्यक्षतः होती ही नहीं, होती है तो कर्ता के मन में बनी उसकी तस्वीर से। जाहिर है कि कोई तस्वीर सबके लिए प्रशंसनीय ही हो, आवश्यक नहीं, एक के लिए जो अच्छी है वह कईयों के लिए कम अच्छी या थोड़ा-ज्यादा बुरी भी हो सकती है। यह इस लेख की, आजतक के मेरे अनुभवों पर आधारित, आधारभूत अवधारणा है। जो इससे सहमत न हों, उनके लिए आगे पढ़ने की जहमत उठाने की जरुरत नहीं। उनके लिए यह कचरा है। तो व्यर्थ अपना कीमती समय क्यों गंवाएं!

और फिर फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर हुआ परिचय, मित्रता या संपर्क तो पहले ही वर्चुअल या आभासी होता है। सबसे पहले तो आपकी प्रदर्शित छवि (display picture-DP) पर राय बनाई जाती है फिर बारी आती है आपके पोस्ट की-लेख, कविता, कहानियों की। बात वहीं खत्म हो जाती तो भी कोई बात नहीं थी, लेकिन फिर शुरु होता है संवाद-प्रतिसंवाद, आपके पोस्ट पर कमेंट्स दिए जाते हैं, आपके द्वारा और आपके मित्रों द्वारा जवाब दिए जाते हैं, जवाबों के जवाब दिए जाते हैं और कर्म चलता रहता है, कभी थोड़े तो कभी लंबे अरसे तक। यह कभी तो शालीनता के स्वीकृत मानकों के अनुरुप होते हैं पर कभी-कभी इस सामाजिक आवश्यकता को दरकिनार कर दिया जाता है और तब यह संवाद थुक्कम-फजीहत बन जाता है। इतना होने के बावजूद कभी तो यह सब शालीनता का लबादा ओढ़े होता है, कभी उसे उतार फेंकता है। शालीन उत्तरों में भी आप अपना अहम्, अपनी पूर्वधारणाएं, अपनी हीन भावना या उच्चता की भावना आदि उगलते हैं, गैर शालीन उत्तरों के बारे में बताने की जरुरत नहीं, क्योंकि उन्हें बिना किसी रोक- टोक के शील-अश्लील सारे भड़ास निकले जाते हैं। अब यह तो सब मानेंगे कि हम बाहर से चाहे कितने ही शालीन, उच्च पदस्थ, प्रतिष्ठित हों, हमारे अंतर के एक कमरे में पशु वृत्तियां भरी हैं। और कोई भी प्रतिक्रिया करते समय उसमें से इन्हें अलग-थलग रख पाना सबके लिए आसान नहीं होता।

और तब निर्मित होती है अंतिम पसंदगी-नापसंदगी! तब बनती है अंतिम राय! और किसी के व्यक्तित्व के संबंध में राय जब एक बार बन जाती है तो बदलती जरा देर से है।

सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे पोस्ट भी मिलते हैं जिनमें विद्वता तो भरी होती है पर उस पर होने वाली टिप्पणियों में किसी या कुछ की पसंदगी-नापसंदगी नहीं होने का विलाप सा किया जाता प्रतीत होता है, पोस्ट भेजने वाले विद्वान द्वारा भी और उनके मित्रों द्वारा भी। कुछ के फेसबुकिया मित्रों ने तो अपने सम्मानित सामाजिक स्थानों की परवाह छोड़कर चाटुकारिता की हदें पार कर रखी हैं, तो ऐसे मित्रों के कमेंट्स ज्यादा ही आते हैं, और ऐसे-ऐसे कि दुर्बल हृदय वाला हृदयाघात से मर जाए यदि समझ ले कि यह सब उसी को इंगित है। अब भई, किसी की खास कोई राय बन गई होगी आपके बारे में! समझ तो गए ही होंगे आप! क्यों!

आप सबकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं बुरी-भली-भदेस कैसी भी, यदि आपने मेरी चेतावनी के बावजूद मेरी इस बकवास को पूरा पढ़ा है!

I think...

काम पूजा है; पूजा काम नहीं

हम हिन्दुस्तानी, चाहे हिंदू हों, मुस्लिम, सिक्ख या पारसी- दुनिया के किसी भी देश के लोगों से ज्यादा समय धार्मिक कर्मकांडों में बिताते हैं। “सात वार और नौ त्यौहार” कहावत ऐसे ही थोड़ा ही न है! धार्मिक अवकाश (घोषित) के दिन, रोज के प्रार्थना/नमाज़/अरदास आदि, सत्संग, प्रवचन, कीर्तन- भजन आदि मैं बिताए घंटे, इन सबका योग किसीको भी दंग करने के लिए काफी है-करोड़ों मानव-घंटों की (आपराधिक) बर्बादी! क्या हमारी तरह का एक गरीब विकासशील देश इतने करोड़ों घंटों का नुक़सान ऐसे कार्यों में कर सकता है जिनसे कोई वास्तविक या कहिए आर्थिक लाभ न हो।

हमें खुद से यह भी पूछना चाहिए कि क्या प्रार्थनाओं और अन्य धार्मिक कर्मकांडों का कड़ाई से पालन करने वाले लोग बड़े पवित्र और भले मानस हो जाते हैं? और क्या यह सच नहीं है कि चोर-डकैत भी अपने अभियानों पर निकलने से पहले अपनी सफलता के लिए इन्हीं देवताओं से प्रार्थना करते हैं? क्या बड़े से बड़ा कर-चोर और कालाबाजारी सबसे ज्यादा धार्मिक होने का ढोंग नहीं करता? सबसे ज्यादा कुकर्म करने वाले ही ईश्वर के सामने सबसे ज्यादा नाक रगड़ते हैं-दरअसल वे अपने पापों व कुकर्मों की माफी मांग रहे होते हैं।

सबसे बड़ी बात कि यह पूजा होती क्या है? “हे ईश्वर, नौकरी लग जाए तो सोलह सोमवार जल चढ़ाऊंगा!”, “इस बार बेटा हुआ तो सवा सौ/हजार/लाख (क्षमता अनुसार) का चढ़ावा चढ़ाऊंगा!” या कि चंदन, सिंदूर, बेलपत्र…… क्या सृष्टिकर्ता इन बातों की अपेक्षा करता होगा अपनी सृष्टि के सबसे विलक्षण जीवधारियों(मनुष्यों) से? समस्त ब्रह्मांड के रचयिता और पालनकर्ता के साथ हम भला किस मूर्खतापूर्ण व्यापार को करने का पाखंड करते हैं? इन शर्तों पर तो कोई बेवकूफ भी आपके साथ कोई व्यापारिक डील न करें, वह तो भगवान है! और क्या हम जानते नहीं कि जो चादरें हजारों पर चढ़ाई जाती हैं, जो मिठाइयां मंदिरों में चढ़ाई जाती हैं, उनका क्या हस्र होता है? वे फिर उन्हीं दुकानों में पहुंचती हैं जहां से खरीद कर लाई जाती हैं!

कोई व्यक्ति कैसे अपना समय व्यतीत करता है, यह पूरी तरह उसका निर्णय है, पर उसे कोई अधिकार नहीं कि वह अपनी धार्मिकता दुसरों पर थोपे! हम बिना अपने सह-नागरिकों की भावनाओं और चैनों-आराम का ख्याल किए बिना ऐसा करते हैं। इसका एक सटीक उदाहरण है लाउडस्पीकरों का प्रयोग- चाहे वह प्रार्थना के लिए हो, कीर्तन, अजान या जागरण के लिए! पूरी रात के जागरण में तो हम हद ही पार कर देते हैं-पूरी की पूरी बस्ती या इलाके की नींद कर लाभ करते हैं, बिना इस बात की परवाह कि उन्हें यह पसंद है भी या नहीं। दूसरा उदाहरण है भीड़ भरी गलियों से धार्मिक जूलूस निकालना, जो पूरी रिहाईस की शांति-व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं! यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदू-मुस्लिम दंगों के सर्वाधिक प्रत्यक्ष कारणों में हिन्दुओं के धार्मिक जूलूस का मस्जिदों के बगल से तब गुजरना जब नमाज़ घर रही हो, या हिंदू मंदिरों के बगल से ताजियों का गुजरना पाया गया है!

यदि हर मद को आबंटित समय की तुलना करें तो हमारे देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सबसे ज्यादा समय धार्मिक प्रसारणों में जाता है।

ध्यान: एक नया फैड
हमारे अर्द्ध शिक्षितों में, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों में, आजकल एक नई बना या झलक देखने को मिलती है-ध्यान (मेडिटेशन) की-पद्मासन में बैठ अपनी श्वास-प्रश्वास को व्यवस्थित और नियंत्रित करना और अंततः दिमाग को रिक्त करना। उच्चतर लक्ष्य होता है मेरुदंड के आधार में सर्प की मानिंद कुण्डली मार के बैठी ‘कुंडलिनी’ को जगाना। जब यह पूरी तरह जंग जाती है, तो समझा जाता है कि व्यक्ति ने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। इससे प्राप्त क्या होता है? – मस्तिष्क की शांति! अब यदि पूछा जाए कि मस्तिष्क की शांति से क्या होता है? तो कोई उत्तर नहीं!

‘मस्तिष्क की शांति’ एक नपुंसक अवधारणा है जो नितांत अनुत्पादक है। इस ध्यान के व्यायाम को उच्च रक्तचाप या मानसिक रोगी से ग्रसित व्यक्ति की चिकित्सा का साधन बनाया जाए तो कोई आपत्ति नहीं-परंतु एक स्वस्थ व्यक्ति में यह रचनात्मकता या उत्पादकता बढ़ाता हो-ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है। इसके विपरीत कई दृष्टांत मिल जाएंगे कि सारे श्रेष्ठ कार्य-चाहे कला के क्षेत्र में हों, साहित्य, विज्ञान या संगीत के क्षेत्र में, सभी सर्वाधिक अशांत वह आंदोलित मस्तिष्कों द्वारा सृजित हैं।

निष्कर्ष रुप में, “काम पूजा है, पूजा काम नहीं!”

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तिरंगे के कुछ रोचक तथ्य

# तिरंगे से संबंधित अनेक महत्वपूर्ण बातों की जानकारी प्रायः उपलब्ध नहीं है। सबसे रोचक बात यह है कि इसमें वास्तव में चार रंग हैं। तीन मुख्य रंगों का, भारतीय मानक ब्यूरो और अंतरराष्ट्रीय स्टैंडर्ड के अनुसार पूरा वर्णन है-भारतीय केसरी, श्वेत और भारतीय हरा। चौथा रंग हैं-गहरा नीला जिसमें तिरंगे की श्वेत पट्टी पर अशोक चक्र अंकित किया गया है, जिसमें 24 धूरियां हैं, भारत की सतत उन्नति का द्योतक, और इसमें भरा गहरा नीला रंग हमारी उन्नति की सीमा इंगित करता है-ऊपर असीमित नीला गगन और नीचे गहरा नीला वरुण।

# 22 जुलाई 1947 को जब पंडित नेहरु ने तिरंगे को भारत का राष्ट्रीय ध्वज के रुप में अपनाने का प्रस्ताव रखा तो संविधान सभा के सामने दो झंडे, एक सूती खादी का और दूसरा रेशमी खादी का, प्रस्तुत किए गए थे। उनमें से सूती खादी का झंडा तो आज भी कानपुर स्थित सूती कपड़ा व पात्र निरीक्षणालय में मुहरबंद है, रेशमी खादी के झंडे का कुछ पता नहीं।

# आम धारणा है कि 1947 में जब देश आजाद हुआ तो लाल किले की प्राचीर पर देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तिरंगा 15 अगस्त को फहराया था, पर यह सच नहीं है। उस दिन प्रातः 0830 बजे वायसराय भवन में स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल के रुप में लाॅर्ड माउंट बैटन ने शपथ ग्रहण किया और फिर 1030 बजे नई सरकार का शपथ ग्रहण हुआ, तत्पश्चात् काउंसिल हाउस(वर्तमान संसद भवन) पर तिरंगा फहराया गया। फिर शाम को पहला सार्वजनिक झंडारोहण समारोह युद्ध-स्मारक इंडिया गेट के पास प्रिंसेज पार्क में संपन्न हुआ। इस तरह उस दिन लाल किले पर झंडा फहराने का समय ही नहीं था। लाल किले पर तिरंगा 16 अगस्त 1947 को प्रातः 0830 बजे फहराया गया।

# 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो सारे देश में सार्वजनिक स्थलों और भवनों पर यूनियन जैक के स्थान पर तिरंगा फहरा दिया गया था, पर देश का एक ऐसा भू-भाग भी था जहां लगभग नौ सालों तक यह पता ही नहीं चला कि देश आजाद हो चुका है। लक्षद्वीप में सबसे महत्वपूर्ण -मिनीकॉय द्वीप पर बने 47 मीटर ऊंचे प्रकाश स्तंभ पर युनियन जैक 02 अप्रैल 1956 तक फहराता रहा।

# भारतीय नौसेना और थल सेना ने 16 दिसंबर 1961 को गोआ, दमन और दीव को पुर्तगाली सरकार के कब्जे से मुक्त करा वहां पहली बार तिरंगा फहराया था।
इसी तरह पांडिचेरी में पहली बार 21 अक्तूबर1954 को तिरंगा पहली बार तब फहराया गया जब फ्रांसीसी सरकार ने समर्पण-पत्र पर हस्ताक्षर किए।
इसके पहले 02 अगस्त 1954 को दादरा-नागर हवेली को लोकशक्ति ने पुर्तगाली सत्ता से मुक्ति दिला वहां तिरंगा फहराया था।

# 26 जनवरी 1950 को भारत जब एक गणतंत्र बना तो भारत के राष्ट्रपति का एक निजी ध्वज बनाया गया जिसमें चार बराबर आयतें बनीं थीं। पहली और चौथी आयत नीले रंग की थी तो दूसरी ओर तीसरी लाल रंग की। पहली में राष्ट्रीय चिह्न अंकित था, दूसरी में हाथी, तीसरी में तराजू तो चौथी में एक छोटे कलश में अधखिले कमल का फूल अंकित था। यह ध्वज राष्ट्रपति भवन और राष्ट्रपति की सवारी पर लगाया जाता था। इसी प्रकार राज्यों के राजप्रमुखों के भी अपने अपने निजी ध्वज थे जिनमें केसरी पृष्ठभूमि पर बादामी रंग में अशोक चिह्न अंकित था और नीचे राज्य का नाम लिखा होता था। सन् 1971 में जब प्रिवी पर्स समाप्त हुआ तो सभी भूतपूर्व देसी राज्यों के शासकों पर अपने अपने राज्यों के झंडे न फहराने का प्रतिबंध लगा दिया गया। उसी समय से राष्ट्रपति और राज्यपालों-उपराज्यपालों ने भी निजी ध्वजों के स्थान पर राष्ट्रीय ध्वज अपना लिया।

# जम्मू और कश्मीर संविधान की धारा 370 के कारण अगस्त 2019 तक अपवाद था। वहां तिरंगे के साथ-साथ जम्मू और कश्मीर का अपना हलधर लाल ध्वज फहराया जाता था; दिल्ली स्थित कश्मीर भवन पर भी यह देखा जा सकता था। पर 05-06 अगस्त 2019 को संसद के दोनों सदनों में बहुमत से और राष्ट्रपति के आदेश संख्या 273 से धारा 370 को पूरी तरह खतम कर दिया गया और जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन ऐक्ट पारित कर  दो केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख बनाए गए। यह पुनर्गठन 31 अक्टुबर 2019 से लागू हुआ और अब जम्मू व कश्मीर का कोई अपना ध्वज नहीं है।(संपादित)

# 29 मार्च 1953 को जब शेरपा तेनजिंग और एडमंड हिलेरी ने पहली बार दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत शिखर माउंट एवरेस्ट पर विजय प्राप्त की, तो तिरंगे को युनियन जैक और नेपाल के झंडों के साथ विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर पर फहराया गया। अब तक पर्वतारोहियों द्वारा माउंट एवरेस्ट पर यह दस-ग्यारह बार फहराया जा चुका है।

# हमारा यह तिरंगा 1971 में अपोलो-15 के साथ संयुक्त राज्य अमरीका और कुछ अन्य देशों के ध्वजों के साथ पहली बार  अंतरिक्ष में भेजा गया। 1984 में यह विंग कमांडर राकेश शर्मा के अंतरिक्ष सूट पर टंग कर गया।

# 09 जनवरी 1982 को जब भारतीय अंटार्कटिका अभियान पहली बार दक्षिण गंगोत्री पहुंचा तो वहां तिरंगा फहराया गया। दक्षिण ध्रुव पर कर्नल जे के बजाज ने इसे 17 जनवरी 1981 को पहली बार फहराया। 28 सितंबर 1985 को कर्नल पी पी चौधरी ने इसे अपनी नौका ‘तृष्णा’पर फहरा कर पूरे विश्व की समुद्री यात्रा करा दी और 10 जनवरी 1987 को भारत लौटे। 30,000 नॉटिकल मील से भी अधिक की समुद्री यात्रा तिरंगे ने 470 दिनों में पूरी की।

# तिरंगा केवल हाथ से बने खादी के कपड़े का ही बनाया जाता है, चाहे वह सूती है या रेशमी, और इसे सिलने के लिए भी खादी का धागा ही प्रयोग किया जाता है। पूरे देश में एक ही जगह, बंगलोर-पूणे रोड पर ‘गरग’नाम के एक छोटे गांव में 1954 में स्थापित एक केन्द्र में ही यह कपड़ा बनाया जाता है। पर झंडों का निर्माण मुख्य रुप से दो तीन जगहों पर होता है- आॅर्डिनेंस फैक्ट्री शाहजहांपुर, खादी ग्रामोद्योग आयोग मुंबई और तीसरा खादी ग्रामोद्योग दिल्ली। लेकिन निजी निर्माताओं द्वारा इसके निर्माण पर कोई रोक नहीं है। नियमत: हाथ से बने एक वर्गफुट के तिरंगे का वजन 250 ग्राम होना चाहिए।

# राष्ट्रीय ध्वज के विषय में एक और अल्पविदित तथ्य यह भी है कि इसके नौ मानक आकारों में पहला 21’x14′ देश के किस इमारत पर फहराया जाता होगा, बहुत पूछ-ताछ करने पर भी पता नहीं चला-क्योंकि लाल किले और राष्ट्रपति-भवन जैसे विशाल भवनों पर भी दूसरे नंबर का मानक आकार, अर्थात 12’x8’के ध्वज ही फहराने जाते हैं। एक सूचना के अनुसार इतने बड़े आकार का झंडा सारे देश में संभवतः केवल एक ही स्थान पर फहराये जाने की संभावना है और वह है मद्रास स्थित सेंट जाॅर्ज फोर्ट, जिस पर देश का सबसे ऊंचा सागवान (टीक वुड) का लकड़ी का ध्वज दंड (45.7 मीटर ऊंचा) लगा है।

# राष्ट्रीय ध्वज का सबसे छोटा मानक आकार, क्रम में नौवां-6″x4″ विदेशियों के साथ राजकीय सम्मेलनों और वार्ताओं के दौरान मेज पर रखने के काम आता हैं। इसे रेशम से बनाते हैं, जबकि दूसरे मानक आकारों के ध्वज सूती खादी के बने होते हैं।

# सरकारी भवनों पर तथा दूसरे अवसरों पर सूती खादी से बने झंडों का ही प्रयोग होता है, पर राष्ट्रीय गरिमा को ध्यान में रखकर 26 जनवरी को राजपथ पर (राष्ट्रपति द्वारा) और 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर पर (प्रधान मंत्री द्वारा) जो ध्वज फहराये जाते हैं, वे रेशमी होते हैं।

# 1987 में आजादी की चालीसवीं वर्षगांठ पर राजधानी दिल्ली में चालीस हजार राष्ट्रीय ध्वज एक सप्ताह तक रात-दिन फहराने गए थे।

# प्रथानुसार सरकारी इमारतों पर केवल एक ही राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है, पर संसद भवन पर तीन राष्ट्रीय ध्वज हर रोज एक साथ फहराये जाते हैं, एक-एक ध्वज लोकसभा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और राज्यसभा अध्यक्ष के लिए होता है। 1985 के पहले, जब सर्वोच्च न्यायालय भी संसद भवन में ही स्थित था, यहां एक साथ चार-चार राष्ट्रीय ध्वज फहराए जाते थे।

# केन्द्रीय सचिवालय के नाॅर्थ ब्लाॅक के विजय चौक की ओर स्थित बुर्जों पर भी एक साथ दो-दो राष्ट्रीय ध्वज फहराते जाते हैं। इसका कारण संभवतः अंग्रेजों के समय से चली आ रही परंपरा है, क्योंकि स्वतंत्रता पूर्व यहां दो-दो यूनियन-जैक फहराए जाते थे, जिनके लिए बुर्जों पर दो-दो तिरछे ध्वज दंड विशेष रुप से लगे हुए हैं।

(भारतीय राष्ट्र ध्वज पर पुस्तक लिखने वाले प्रथम लेखक लेफ्टिनेंट कमांडर के वी सिंह रचित “तिरंगे की गौरव गाथा” नामक पुस्तक से साभार)

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अंग्रेजी बनाम हिंदी

किसी भी समाज की भाषा उसकी गरिमा और सांस्कृतिक पहचान की वाहिका भी होती है और उसकी कसौटी भी। परिवर्तन का माध्यम वही भाषा बन सकती है जो जनता की अपनी है, विशेषकर आज के लोकतान्त्रिक युग में। शक्तिवानों व उच्च वर्ग की भाषा (हमारे देश में अंग्रेजी) के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन की चाह करना आसमान के तारे तोड़ लाने जैसा है।

भारतीय भाषाएं पीछे छूट गई हैं, क्योंकि आर्थिक जीवन में आज अंग्रेजी महत्वपूर्ण है। अपनी-अपनी मातृभाषा में शिक्षित नौजवानों को एक तो नौकरी मिलती नहीं, और अगर मिल भी जाती है तो अंग्रेजी में उनकी कमजोरी उन्हें पदोन्नत्ति की होड़ में पीछे छोड़ देती है। असफल होने की यह जो गांठ पड़ गई है उनके दिलों में, कि वे यह समझने लगे हैं कि अपनी मातृभाषा में लोक-व्यवहार करने से उनकी प्रतिष्ठा घट जाएगी और उन्हें पिछड़ा माना जाएगा। इसीलिए तो हिंदी दिवस पर मंचों से हिंदी  का गुणगान करने वाले भी व्यवहार में अंग्रेजी के आगे अपना शीश नवाते हैं,अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों-महाविद्यालयों व् संस्थानों में ही पढ़ाते हैं, खुद भी बातचीत करने में भले ही अच्छी न हो, शुद्ध न हो, अंग्रेजी का प्रयोग करके गर्व का अनुभव करते हैं।  

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक योजनायें ,समितियां- उपसमितियां,पद आदि बने हैं, विभिन्न स्तर के दौरे होते हैं, खूब पैसा खर्च किया जाता है। पर इन सबका मकसद यही रहा है कि अंग्रेजी शंब्दों के समानार्थी हिंदी शब्द गढ़े जाएं और सरकारी कामों में उनका उपयोग किया जाय। इक्के-दुक्के को छोड़ कर सारे राजभाषा अधिकारी अनुवाद की जहमत उठाने को मजबूर हैं और उनके बच्चे भी शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को ही चुनते हैं।

हिंदी को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अंग्रेजी का स्थानापन्न बनना है, उसके साथ न सिर्फ दौड़ना है बल्कि उससे आगे निकलना है। उसे मौलिक रचनात्मकता की ताकत भी बनाए रखनी है। यानी आज की जोखिमों और अपनी समृद्ध विरासत का सृजनात्मक समन्वयन करना है। साथ ही उसे हिन्दी-भाषी समुदाय को अंग्रेजी के आतंक से मुक्त भी कराना है। इससे भी बढ़कर इसे उन हिन्दी के अंधभक्तों का भी सामना करना है जो यक-ब-यक इसे राष्ट्रभाषा बनाने और सिर्फ तत्सम व तद्भव शब्दों के प्रयोग का आग्रह रखते हैं। उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को वे विजातीय मानते हैं, विदेशी शब्दों की तो बात ही छोड़ दें। पर भारतीय संस्कृति की सामासिकता और हमारे एक बहुभाषी राष्ट्र होने के तथ्य को कैसे भुलाया जा सकता है। हिन्दी चाहे कितनी भी वैज्ञानिक भाषा हो, सीखने में चाहे कितनी भी सरल क्यों न हो, हिंदीतर मातृभाषाओं का स्थान भला कैसे ले सकती है? इसलिए, उचित तो यही होगा कि यह पहले देश की संपर्क-भाषा बने और तब धीरे-धीरे यदि समस्त भारतीय स्वीकार करें, राष्ट्रभाषा बनने के मार्ग पर प्रशस्त हो। समस्त भारतीयों द्वारा इसको स्वीकार्य बनाने के लिए हमें हिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिंदीतर भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य करनी होगी!

स्थिति लेकिन विपरीत है। अंग्रेजी ने भारतीय कुलीन वर्ग को कमोबेश अपना गुलाम बना रखा है। अंग्रेजों के राज के खत्म होने के 74 सालों के बाद भी भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में अंग्रेजी का राज बदस्तूर जारी है। यह पहले तो दफ्तरों और उच्च शैक्षिक संस्थाओं तक ही सीमित थी पर अब इसने रसोईघरों तक में घुसपैठ कर ली है। आज अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत भी 1947 से कहीं ज्यादा है। फिर भी, यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत गांवों का देश है, और आज भी हमारे अधिकतर देशवासियों के लिए अंग्रेजी एक अनजानी और परायी भाषा है। वे सामान्यतः भारतीय भाषाओं में ही संस्कारित भी होते हैं और खुद को अभिव्यक्त भी करते हैं। महानगरों और मंझोले शहरों में अंग्रेजी की चौंध के बावजूद देश के देहातों और कस्बों में झिलमिलाते भारतीय भाषाओं के दीपों को दीप-माला का रुप देने की जरुरत है, जो हमारे मन से अंग्रेजी के सांस्कृतिक व बौद्धिक साम्राज्यवाद के अंधेरे को खतम करे, हमें आत्मगौरव के भाव से रोशन करे।

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आरक्षण का विरोध

नौकरियों की जमा संख्या,
आकलन कभी किया है क्या?
दो फीसदी ही हैं सरकारी,
सारी मेधाएं खपेंगी क्या?
अपवादों को छोड़ समझ लो,
मेधा पैसों का प्यादा है,
पैसे ऊँचों के पास अधिक हैं,
निचली जाति निर्धन ज्यादा है!
ऊंच नीच की यह खाई,
मिटेगी बोलो कैसे भाई,
संविधान में बराबरी की,
कसम हमने क्या झूठी खाई?
झूठी बात कि देश है बंटता,
जाति धर्म के नाम पे अब,
शुरू से होता रहा है ये सब,
ये गलती भी हमारी है सब!
ऊंच नीच की जाति प्रथा,
हम ऊंचों ने ही फैलाई,
धर्म अन्य कोई भी हो,
कभी ना हमको मन से भाई!
करें जागरण कीर्तन हम,
शोर करें हम जितना ज्यादा,
दो लम्हों के नमाज से लेकिन,
पड़े हमारी शांति में बाधा!
निचलों को भी बराबर समझें,
हमने कभी किया है क्या,
उनका साथ ना होता तो खुद को
आजाद भला कह पाते क्या?

राजनीति की अच्छी छेड़ी,
ओछी जैसे ये आज हुई!
जितने ओछे हम होंगे,
राजनीति भी होगी मुई!

देश को यदि बचाना है तो,
खोलो आँख और रखो भान,
सचेत रहो, फैलाओ चेतना,
बकवासों पर ना दो ध्यान!
गलत नीतियों, फैसलों का,
करो विरोध, और रखो ज्ञान,
प्रगति पथ में सहयोगी है,
बाधा कभी नहीं है संविधान!

Poems

मर्द जाति से गुहार!

नारी;
मत पूजो इन्हें!

हाड़ मांस की बनी,

बिल्कुल तुम्हारी ही तरह,
चैतन्यता में तुमसे
जरा भी कम नहीं है ये!

क्योंकि नहीं हैं ये मूर्तियां!
मूर्तियों की ही तो करते हो पूजा,
दुर्गा, काली, पार्वती, संतोषी, सीता….?

तुम्हारी
शारीरिक शक्ति में श्रेष्ठता?
अरे पूछ देखो,
अपनी सारी नस्लों से!
कैसी-कैसी आचार-संहिताओं,
स्मृतियों, शास्त्रों व उपनिषदों
की सहायता से,
इन्हें दबाया और मारा गया है!

इन्हें आदमी समझें बस!
अपने बराबर!
काफी होगा!
अपना रास्ता बनाना
आता है इन्हें!!!

Poems

रेल यात्रा


लेख नहीं ये आंखों देखी, औ’ है भुगती बात, रहे संग परिवार के, रेल में हम दो रात!

सहयात्री कटनी में उतर के घर को धाए, अब आए कई बे टिकट औ’ देखें दाएं बांएं!

पहले को तो सच, टी टी ने ही था भेजा , “बस मुगलसराय तक!” कहते आया दूजा!

इनकार कड़क मेरा था दोनों भाग गए, पर नींद तोड़ दी, पूरी रात हम जगे रहे!

ऊपरी कमाई टी टी ने चाही तो क्यों? जल्दी से समृद्ध बनें, आवश्यक ज्यों!

‘जैसी करनी वैसी भरनी’ याद रहे तो कैसे? नंगी आंखें तो उल्टा देखें सारे जग में वैसे!

भ्रष्ट दिखे ना कहीं कष्ट में, मंत्री हो या नेता, फिर टी टी क्यों ना बने भ्रष्ट, क्यों मारा जाए सेंता!

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Wife

1. You can remain happy only when you keep your wife happy- however, surely, it’s a very challenging idea!

2. Promises made to your wife may land you in a lot of Dharam Sankat/dilemma– remember the story of King Dashrath and his queen Kaikeyee!

3. Boring is the wife who receives her husband with a smile every day on his return home, who appreciates any saree brought for her whether she likes it or not, and who does not pull-up her husband at least three times a day!

4. Wives are happy when they are unhappy- so do not take their unhappiness to heart- upto six times a day! She doesn’t want her married life jinxed!

5. Agree with her- but do exactly what you want to do and in case she catches you red-handed, say sorry. Nine out of ten times she may not even remember what she said earlier. Managing and making your wife is an art and not a science!

6. First do whatever she says. It’s simple. Make common sense your friend. The tiger versus mosquito lesson is relevant here: you can not concentrate on shooting a tiger unless you kill all the mosquitoes first! Keep your DO IT NOW pad ready for family members to write down what they would like you to do.

7. Say sorry- whether it is your fault or not- what difference does it make if you say sorry to her even if you think that she is wrong to the extent of 70%. Even if she is wrong to the extent of 99% (very often she is!), say sorry, and she will soon realise her mistake. Between you two it hardly matters who is right and who is wrong-eventually both get hurt. Learn from every incident which makes your wife unhappy- maybe for silly reasons like jealousy/boredom.

8. Smile-it’s an inexpensive way to improve your looks. “Laugh and the world laughs with you, cry and you cry alone”, “I had the blues, because I had no shoes, until upon the streets I met a man who had no feet”. Think of all we have to be grateful for, and thank God for all our boons and bounties. Think, thank and smile. Say cheers! A bit loudly please! She may not be able to solve some of your silly problems; so why come home with a grouchy face- remember that she will make it worse!

9. Decision-making is extremely tough and more so for a woman because she cares for you too much. So make and take decisions quickly, for her, when asked for!

10. Follow the Pygmalion way: Pygmalion, a legendary figure of Cyprus in Greek mythology who was a king and a sculptor who had resolved to remain unmarried, but he carved such a beautiful ivory statue of a woman that he fell in love with her and married the sculptor which changed into a woman under the Goddess of love- Aphrodite’s blessing., Pygmalion married Galatea, the animated statue. Once you start thinking that your wife is a very good wife, a very good mother, a very good daughter-in-law, and you keep thinking that way all the time, she will turn into all the things you imagine her to be. Once you make your golden tongue work for you with your mind in the right gear, your wife will become “My Fair Lady”!

11. It is highly unlikely that a man will get a perfect wife or a woman will get a perfect husband. Use your mental knife to cut out your wife’s bad points and you will find her 96% too good to be true!

12. Don’t be a miser- be generous with praise, admiration and appreciation for whatever she does and be prepared for her not reciprocating as generously or as often as you would wish. But don’t overdo it and also ignore her initial surprises!

13. Encourage your wife to flow in limelight- discover her hidden talents and let her take part in social events!

14. Be her ‘punching bag’- she knows that you are the only person in the world who will take her shouting- hence, relax- even when she shouts at you and she will eventually become your profitable partner!

15. All day long she has to tolerate small irritations from the children and the household chores and as soon as you come late from your office, she explodes on seemingly small lapses on your part. Ignore such outbursts and relax. All she wants is more of your time and care/tolerance.

16. Don’t expect gratitude (even) from your wife, because it is natural for people to forget to be grateful. And if you ever get it, consider it a matrimonial medal. Whenever you do something for your wife, do it for the inner joy of giving. Start being grateful yourself for whatever your wife, your children, or your friends do for you and it is only then possible that your wife and the others may get the hint!

17. Learn to say ‘NO’ occasionally. This will be a long-term investment to prove that you are the husband. Fight for the king and sacrifice the pawns.

18. If you want to be happy for a lifetime…… learn to love your wife every minute. And show her that you love her. Tell her mother that you love her daughter!

(Source: Unknown)

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तनावों को सहने के अभ्यास

शीर्षक का पहला शब्द है ‘तनाव’। जाहिर है कि यह दो तरह का हो सकता है: शारीरिक, जो किसी भी क्रिया को करने पर होता है; आप बैठे हैं, लेटे हैं, सोए हैं, आराम कर रहे हैं और कोई काम आ पड़ा, आप उसे करने के लिए उठेंगे तो तनाव होगा। ये दूसरी बात है कि इस तरह की बातों में तनाव कोई भी आम तौर पर महसूस नहीं करता, तब तक जब तक आपको बेमन उठना और कुछ करना न पड़े। अब आपको लघु शंका करनी हो, तो इसके लिए जो आपको उठना और बाथरूम तक जाना पड़ेगा, थोड़े ही न आप इसको तनाव कहेंगे या समझेंगे? लेकिन यदि किसी पड़ोसी ने आपके आराम में खलल डाल दी तो उसके लिए दरवाजा खोलने के लिए उठने को भी आप तनाव की संज्ञा देंगे, (यद्यपि कि तब नहीं यदि उसके साथ या बिना सुंदर सी पड़ोसन दरवाजे पर हो)।

दूसरे तरह का तनाव मानसिक होता है। मानसिक तनाव अनेकों प्रकार के होते हैं। बल्कि ये कहना कि शारीरिक तनाव भी पहले मस्तिष्क में ही उपजते हैं, ज्यादा उचित होगा। आपको कोई आर्थिक समस्या है, आपका मस्तिष्क तनावग्रस्त हो जाता है, कोई रोग, कोई शारीरिक क्लेश, आपको या आपके किसी प्रियजन को हो, तनाव होना अवश्यंभावी! मुहल्ले के किसी असामाजिक तत्व से कोई दिक्कत, तनाव लाजिमी! यानी कि तनाव अनेक और इसके कारण अनेकों!

किसी भी तनाव को हम तब तक सह लेते हैं या कहो कि तनाव कहते ही नहीं है जब तक वह एक खास सीमा नहीं पार कर जाता। यह सीमा विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न होती है। अंग्रेजी में इसे ‘यू- स्ट्रेस’ कहते हैं, हिंदी में ‘असहनीय तनाव’ कह सकते हैं। मतलब वह तनाव जो आपके मन को नहीं भाता। या तो आप उसे करना नहीं चाहते या वह आपके मन को उद्वेलित,दिग्भ्रमित या विक्षिप्त कर देता है। जैसा हमने देखा कि अलग अलग लोगों कि तनाव को सहन करने की क्षमता अलग अलग होती है अतः कोई किसी खास विषय पर तनाव महसूस करता है और कोई इस उससे जरा भी परेशान नहीं होता।

अब इस तरह के तनावों से तो जीवन अटा पड़ा है; हर क्षण, हर कदम पर तनाव है। तो फिर इनसे पार कैसे पाया जाए? हमने देखा कि जिस तनाव को हम सह सकते हैं, वह कोई खास बात होती ही नहीं हमारे लिए, हम उसे तनाव कहते भी नहीं, इसके बारे में सोच कर जरा भी परेशान नहीं होते! पर जब वो सहने की सीमा पार कर जाता है, तो हमारे जीवन में भूचाल आ जाता है; कई लोग तो अपना जीवन समाप्त कर लेने की कोशिश तक कर लेते हैं और सौभाग्यवश यदि असफल हो जाते हैं तो समाज में तिरष्कृत का जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

क्या कुछ किया जा सकता है जिससे ऐसी अवस्था ही पैदा ना हो! अथवा, तनाव सहने के लिए व्यक्ति को तैयार करने का कोई ढंग है क्या?

मैं ये जो कुछ लिख रहा हूं, इसका श्रेय जाता है 1992-93 में उत्तर लेई वायु सेना स्टेशन के तत्कालीन मुख्य प्रशासन अफसर विंग कमांडर चौधरी को जिन्होंने ये बात मुझे बताई थी एक तथाकथित सच्ची कहानी के माध्यम से।

उस समय मैं जैसलमेर के वायु सेना स्टेशन के मुख्यालय में तैनात था और स्टेशन कमांडर के निर्देश पर उक्त अफसर से किसी महत्वपूर्ण कार्यवश मिलने उत्तर लेई गया था। साप्ताहिक अवकाश होने के कारण कार्यालय खुले नहीं थे अतः उन्होंने मुझे अपनी बैठक में बिठाया और फोन के जरिए अपने मातहतों से वो कागजात मंगाए जो मेरे कमांडर ने मंगाए थे! इस दौरान साहब ने समय काटने के लिए चाय पीते पिलाते एक कहानी सुनाई जो मुझे जीवन भर नहीं भूलेगी।

उन्होंने एक दूसरे अफसर की कहानी सुनाई जिनकी एक प्यारी सी इकलौती बेटी थी और शुरू से ही इसका लालन पालन उन्होंने इस तरह किया कि वह जिस चीज पर अपनी उंगली रख देती थी वह चीज उसे मिल जाया करती थी! अर्थात उसने कभी भी “नहीं” सुना ही नहीं था! दुर्भाग्यवश, एक दिन उस बच्ची के माता पिता कार दुर्घटना में काल कवलित हो गए उसे नितांत अकेला छोड़कर! उसे किसी नजदीकी रिश्तेदार ने पालने का बीड़ा उठाया। आज तक की सिर्फ “हां” सुनी हुई बच्ची को अब हर वक्त दुनियां की “ना” सुननी पड़ी, वह इस बात से तालमेल नहीं बिठा सकी और चौदह पंद्रह की आयु में ही उसने आत्महत्या कर ली!

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि बच्चों को शुरू से ही ‘ना’ सुनने की भी आदत डालनी चाहिए! क्योंकि इतना तो तय है कि जीवन में, दुनिया में, हर जगह ‘हां’ तो मिलने से रहा! ज्यादातर नकारात्मकता ही भरी हुई है! अतः, आप कितने भी संपन्न हों, अपने बच्चे को, जो भी वह मांगे, बिना सोचे समझे मात्र इसलिए न दें क्योंकि आप समर्थ हैं! बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए यदि वह चीज जरूरी नहीं है तो बेशक आप उसके लिए ना करें और मजबूती से करें। इसके लिए डांटने–मारने की जरूरत नहीं, क्योंकि वह फिर दूसरी अति हो जाएगी जिससे आगे चलकर बच्चे के व्यक्तित्व का विकास अच्छी तरह नहीं हो पाएगा। सिर्फ आपको अपनी ‘ना’, दृढ़ता से कहनी होगी।

इसे आप चाहें तो व्यक्तित्व को तनावों को सहने के काबिल बनाने के लिए बचपन से ही करवाया गया व्यायाम या अभ्यास कह सकते हैं।

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शौकिया लेखन

मेरी नहीं ये पंक्तियाँ सुविख्यात श्री रामधारी सिंह दिनकर की हैं(‘संस्कृति के चार अध्याय’- तृतीय संस्करण की भूमिका से उद्धृत) :

“साहित्य की ताजगी और बेधकता जितनी शौकिया लेखक में होती है, उतनी पेशेवर में नहीं होती. कृति में प्राण उंडेलने का दृष्टांत बराबर शौकिया लेखक ही देते हैं. थरथराहट, पुलक और प्रकम्प, ये गुण शौकिया की रचना में होते हैं. पेशेवर लेखक अपने पेशे के चक्कर में इस प्रकार महो रहते हैं कि क्रांतिकारी विचारों को वे खुलकर खेलने नहीं देते. मतभेद होने पर भी वे हुक्म, आखिर तक, परंपरा का ही मानते हैं.

संस्कृति का इतिहास शौकिया शैली में ही लिखा जा सकता है. इतिहासकार, अक्सर एक या दो शाखाओं के प्रामाणिक विद्वान होते हैं. ऐसे अनेक विद्वानों की कृतियों में पैठकर घटनाओं और विचारों के बीच सम्बन्ध बिठाने का काम वही कर सकता है, जो विशेषज्ञ नहीं है, जो सिक्कों, ठीकरों और इंटों की गवाही के बिना नहीं बोलने की आदत के कारण, मौन नहीं रहता. सांस्कृतिक इतिहास लिखने के, मेरे जानते दो ही मार्ग हैं. या तो उन्हीं बातों तक महदूद रहो, जो बीसों बार कही जा चुकीं हैं, इस प्रकार खुद भी बोर होवो और दूसरों को भी बोर करो; अथवा आगामी सत्यों का पूर्वाभास दो, उनकी खुलकर घोषणा करो और समाज में नीमहकीम कहलाओ, मूर्ख और अधपगले की उपाधि प्राप्त करो।

अनुसंधानी विद्वान सत्य को तर्क से पकड़ता है और समझता है सत्य, सत्य सचमुच उसकी गिरफ्त में है। मगर इतिहास का सत्य क्या है? घटनाएं मरने के साथ फोसिल बनने लगती हैं, पत्थर बनने लगती हैं, दन्तकथा और पुराण बनने लगती हैं। बीती घटनाओं पर इतिहास अपनी झिलमिली डाल देता है, जिससे वे साफ-साफ दिखाई न पड़ें, जिससे बुद्धि की ऊंगली उन्हें छूने से दूर रहे। यह झिलमिली बुद्धि को कुंठित और कल्पना को तीव्र बनाती है, उत्सुकता में प्रेरणा भरती और स्वप्नों की गांठ खोलती है। घटनाओं के स्थूल रुप को कोई भी देख सकता है, लेकिन उनका अर्थ वहीं पकड़ता है, जिसकी कल्पना सजीव हो। इसलिए, इतिहास का सत्य नहीं एक अनुसंधानों से खंडित हो जाता है, लेकिन, कल्पना से प्रस्तुत चित्र कभी भी खंडित नहीं होते।