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हिंदी को उचित दर्जा कब

यूरोप में जब पुनर्जागरण आरंभ हुआ यानी आधुनिकता ने उसके द्वार खटखटाया तो सबसे पहला झटका लगा लैटिन के एकक्षत्र साम्राज्य को। चुनौती दी स्थानीय भाषाओं नें। जर्मन, फ्रेंच, अंग्रेजी, डच, चेक, स्लोवाक आदि भाषाओं के जरिए राष्ट्रों ने अपने स्वतंत्र अस्तित्व की अभिव्यक्ति की! खुद लंदन में अदालतों का काम, राज काज, बड़े बड़े बौद्धिकों का लेखन लैटिन में चलता था। अंग्रेजी में बहस करने वाले वकीलों पर जुर्माना लगाया जाता था। लैटिन छोड़ किसी अन्य भाषा में लिखने वालों को दूसरे दर्जे का बौद्धिक माना जाता था। लेकिन ज्यों-ज्यों आधुनिकता की चेतना बढी, जनता ने अपनी अपनी भाषाओं के लिए जमकर संघर्ष छेड़ा और उसे परवान चढाया।
अर्थात, इतिहास कहता है कि अपनी भाषा का- स्व-भाषा का समुत्कर्ष आधुनिकता का अनिवार्य अंग है।
आधुनिक/विकसित जनतांत्रिक राज्य वही है जिसमें अधिकांश जनता शाषण में पूरी तरह भाग ले। हमारी स्थिति “कोऊ होंहिं नृप हमें का हानी, चेरी छोड़ि कि होएब रानी ” वाली है।
इसका कारण यही है कि 1. हमारा मानक संविधान अंग्रेज़ी में है, 2. योजनायें अंग्रेजी में बनती हैं, 3. संसद में अंग्रेजी बोलने वालों की आज भी तूती बोलती है।
राजभाषा हिंदी में यह सब क्लिष्ट अनुवाद के माध्यम से उपलब्ध होता है, जो मात्र विद्वानों की समझ में आ सके तो आ सके, आम जन के लिए तो वह भैंस के आगे बीन बजाने समान ही है।
अंग्रेजी की अनिवार्यता ने करोड़ों बच्चों को दिमागी तौर पर अपाहिज बना दिया है। अंग्रेजी रटने के चक्कर में वे दूसरे विषयों में दक्ष नहीं हो पाते। कुछेक हजार लोंगों की विदेशी भाषा की जरूरतों को पूरा करने के लिए करोड़ों पर अंग्रेजी थोप देना लाजमी नहीं कहा जा सकता।
अंग्रेजी में बनने वाली हमारी पंचवर्षीय योजनाओं, विदेश नीतियों को अमरीका और इंग्लैंड का मज़दूर भी समझ सकता है लेकिन जिसके पसीने की कमाई को राष्ट्र हित (?) में लगाने और जिसकी उन्नति के लिए ये बनती हैं, वे इससे अनभिज्ञ रहते हैं।

हाल ही में एक वरिष्ठ मित्र नें कहा कि राजनीति की समझ आम जनता में नहीं।

अरे होगी भी कैसे, अंग्रेजी में पैदल जो है!

जापान ही को ही लें, आधुनिकीकरण व औद्योगिकीकरण भारत में पहले शुरु हुआ, लेकिन विकास में वह भारत से कोसों आगे है। क्योंकि उसने पश्चिम के अनुभवों का लाभ जरूर उठाया, पर अपनी भाषा में। अपने वैज्ञनिकों, किसानों, मजदूरों को अपनी ही भाषा में सारा ज्ञान उपलब्ध कराया। कुछ चतुर अनुवादकों की मदद से हम भी यह कर सकते हैं। वैज्ञनिकों की जो शक्ति प्रयोगों मे लगी, वह वहां अनिवार्य जर्मन या अंग्रेज पढने/रटने में जाया नहीं हुई। दूसरे शब्दों में अंग्रेजी की अनिवार्यता नें भारत के विकास की दर धीमी की है।
120 वर्ष पहले तक फिनलैंड के लोग स्वीडी भाषा का इस्तेमाल करते थे, आज़ाद होते ही फिनी में सारा काम शुरू कर दिया। जार के जमाने में रूस में फ्रांसीसी का दबदबा था, लेनिन ने एक झटके मे फ्रांसीसी को खत्म कर दिया। तंज़ानिया और लीबिया में भी यह हो रहा है।

भारत में कब होगा यह, कब तक विदेशी भाषा अंग्रेजी राज करती रहेगी और देशी भाषाएं भीख मांगती रहेंगी या अपना अस्तित्व बचाने के लिए एक तरह चिरौरी करती रहेंगी और???

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आरक्षण का विरोध

नौकरियों की जमा संख्या,
आकलन कभी किया है क्या?
दो फीसदी ही हैं सरकारी,
सारी मेधाएं खपेंगी क्या?
अपवादों को छोड़ समझ लो,
मेधा पैसों का प्यादा है,
पैसे ऊँचों के पास अधिक हैं,
निचली जाति निर्धन ज्यादा है!
ऊंच नीच की यह खाई,
मिटेगी बोलो कैसे भाई,
संविधान में बराबरी की,
कसम हमने क्या झूठी खाई?
झूठी बात कि देश है बंटता,
जाति धर्म के नाम पे अब,
शुरू से होता रहा है ये सब,
ये गलती भी हमारी है सब!
ऊंच नीच की जाति प्रथा,
हम ऊंचों ने ही फैलाई,
धर्म अन्य कोई भी हो,
कभी ना हमको मन से भाई!
करें जागरण कीर्तन हम,
शोर करें हम जितना ज्यादा,
दो लम्हों के नमाज से लेकिन,
पड़े हमारी शांति में बाधा!
निचलों को भी बराबर समझें,
हमने कभी किया है क्या,
उनका साथ ना होता तो खुद को
आजाद भला कह पाते क्या?

राजनीति की अच्छी छेड़ी,
ओछी जैसे ये आज हुई!
जितने ओछे हम होंगे,
राजनीति भी होगी मुई!

देश को यदि बचाना है तो,
खोलो आँख और रखो भान,
सचेत रहो, फैलाओ चेतना,
बकवासों पर ना दो ध्यान!
गलत नीतियों, फैसलों का,
करो विरोध, और रखो ज्ञान,
प्रगति पथ में सहयोगी है,
बाधा कभी नहीं है संविधान!

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WHY?

(Collected from somewhere!)

  1. Swimming is a good exercise to stay fit. But whales are fat! Why?
  2. The place where people sit in a stadium is called ‘stand’! Why?
  3. Everyone wants to go to heaven, but no-one wants to die! Why?
  4. We have freedom of speech, but we get telephone bills! Why?
  5. Money doesn’t grow on trees, but banks have branches! Why?
  6. Glue sticks everything, but it doesn’t stick to the bottle it is kept in! Why?
  7. It’s already built, but we call it a ‘Building’! Why?
  8. We are here to help others! What are others here for?
  9. We are not supposed to drink and drive, but bars have parking lots! Why?
  10. All the nations are in debt! Where did all the money go?
  11. When dog’s food is new with ‘improved taste’, who tastes it?
  12. ‘Black Box’ flight recorder is not damaged in a crash, still the whole airplane is not made of the same stuff! Why?
  13. People say, “You’ve been working like a dog”, but dogs just sit around all day! Why?

We are all living in a seriously funny world! Isn’t it?

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भूल गई कविताई (2012)

‘पत्नी’, यानी उनकी,

मैनें तो की बड़ाई!

लिख ‘पत्नी के फायदे’

उनकी खूबियां गिनाई!!

सारी दूसरी पत्नियों नें (अफ़वा की मीटिंग में)

मुझे खूब खूब सराहा!

पर, मेरी पत्नी ने,

जानते हैं, क्या कहा?

कि हमसे उनका रिश्ता,

पतंग की डोर है,

और ये कि मेरे हाथ में,

उस डोर की छोर है!!

कहा, ‘डोर हो तो आज़ादी बेमानी’!

यानी… कि वह परतंत्र हैं..

मतलब लगाओ तो येऽऽ कि,

होना चाहतीं स्वतंत्र हैं!!

ऐसा मैनें कह क्या दिया कि,

घर में हुआ बवाल,

औ’ हालत ऐसी हुई क्या कहूं,

जीना हुआ मुहाल!!

घर में हमारे, ऊफ!

आ गई बड़ी सी आफत,

बचने को उठानी पड़ेगी अब,

न जाने कितनी जहमत!!

मेरी अपनी, खास अपनी, पत्नी,

हो गई बहुत हैं गरम,

चन्द्रमुखी टर्न्ड इन्टु ज्वालामुखी,

जरा भी ना रहा भरम!!

हम भी थोड़ा अकड़े तो,

घर में छिड़ी लड़ाई,

कुछ भी सोचें-करें हम,

विपरीत उन्हें दे दिखाई!!

ठंडे हुए और माफी मांगी,

पर ना दे उन्हें सुनाई,

संबंध पति पत्नी का नहीं अब,

हम नारी-पुरुष हैं भाई!

दो दर्शन दो नीति हैं घर में,

दो ही संतान बनाई,

वो जिसे अपनाएं चाहे,

चुप्पी में ही अपनी भलाई!!

काटा था पागल कुत्ते ने, जो

बनने चले थे कविराई!

अब आफ़त आई ऐसी है,

कि भूल गई कविताई!!!!

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इच्छायें

इच्छायें कितनी भी बलवती हों,

अगर उनका पूरा होना,

किसी और पर मुनहसर है,

तो आपको बहुत बहुत तकलीफ़

हो सकती है।

आखिर कितना साधन संपन्न

हो सकते है आप?

दूसरे से अपनी इच्छा मनवाना

भला कैसे संभव है!

फिर,

अपनी इच्छाओं को काबू करना

अकेला विकल्प बचता है!

कभी पढ़ा था, ‘भू- दाह’,

बुद्ध की शिक्षाओं का सार,

इच्छाओं का त्याग या शमन नहीं,

उनसे कहीं ऊपर उठ जाना!

पर सभी कहां हो पाते बुद्ध, महावीर,

कहां हो पाते लीन इतना

‘उस’ में, ‘ध्यान’ में, ‘भगवान’ में,

कि भोजन व वस्त्र तक भूल जाएं!

और फिर क्यों करें वो ऐसा?

एक और पंथ या धर्म चलाने को?

अधिक किया क्या इन महानों ने?

कहां कुछ भी बदला है धरा पर,

अनगिनत पंथों ने संसार के?

मानवता चल रही वही-

ढाक के तीन पात!

जब तक जीवन रहेगा,

रहेंगी इच्छाएं बदस्तूर,

सुंदर भी बदसूरत भी,

और इनके कारण होते रहेंगे,

सृजन भी, विध्वंस भी,

प्यार भी, तकरार भी,

संबंध और विच्छेद भी!

संसार ऐसे ही चलता रहेगा,

इच्छाओं की ही रफ्तार से,

कभी मंद मंद, कभी तेज तेज,

कभी गिरता, कभी संभलता,

कभी बनता बनाता,

तो कभी बिगड़ता बिगाड़ता,

इच्छाओं का होना शाश्वत जो ठहरा!

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मिटाओ न खुद को अपनों पर

मानो न हार,

करती रहो गुहार!

सपने सपने हैं,

मेरे हों कि तुम्हारे!

मजबूत बनने की,

या कि,

दुनिया में कुछ फर्क लाने की,

अपना वजूद साबित करने की,

या कि,

खुदमुख्तार बनने की!

उम्र के उस,

रंगीन मुकाम पर आकर,

तुम्हारे सपनों में आता है,

पता नहीं कहां से,

एक राजकुमार!

स्वाभाविक है यह संबंध,

जरूरी है यह सम–बंध,

जहां दो समान बंधें आपस में,

व्यक्ति को पूरा होने के लिए!

पर होता इसका उल्टा है,

संबंध बंधन बन जाते हैं,

सम– बंध नहीं रहते,

बंधते तो हैं, पर

समानता गुम जाती है!

शादी, बच्चे, बच्चों की शादी,

फिर उनके बच्चे…., और बस!

खत्म हो जाती है,

तुम्हारे सपनों की दौड़!

पर,

खतरनाक है यह मोड़,

जहां तुम्हारा ‘मैं’ खो जाता है,

तुम हो जाती हो,

दूसरों के लिए,

जिन्हें तुम अपना कहती हो,

रहती हो मुगालते में,

‘अपनों’ के लिए कुर्बानी के,

मिट जाती हो तुम,

हो जाती हो–बिल्कुल खत्म!

या मैं–पुरुष, समझाता हूं,

मनाता हूं,

ललचाता हूं,

आराम के साधन भरता हूं,

घर में,

ताकि तुम चांदी की कटोरी से,

पानी पियो और,

सोने के पिंजड़े में,

आराम से रहो और,

भूल जाओ,

निर्बंध नदी जैसी,

बिना डोर के पतंग जैसी

सपनों की अपनी उड़ान को,

और, इस बंधन को ही,

अपनी नियति मान लो!

तुम ऐसा ही,

करती भी ही,

बिना सोचे, समझे,

बिना जाने,

कि ऐसा कर के,

आधा कर देती हो,

विकाश की उस गति को,

जो दूनी होती यदि,

तुम्हारे सपने भी जिंदा रहते!

दरअसल, तुम जिंदा रहतीं उनमें,

पर, अब कहता हूं,

आधी तुम हो, आधा मैं,

न मानो बनूं यदि बाधा मैं,

परवान करो तुम सपनों पर,

मिटाओ ना खुद को अपनों पर!

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धर्म

हिन्दू धार्मिक वाङ्गमय मानव जीवन को चार आश्रमों में विभाजित करता है। जीवन-चर्या के सामान्य विधान इन सभी में कमो बेस समान हैं, परंतु हरेक के कुछ विशिष्ट विधान भी हैं। जैसे ब्रह्मचर्य में आत्मिक- मानसिक और शारीरिक शुचिता, विद्याध्ययन और गुरु के आश्रम में रहते हुए भिक्षाटन आदि पर ज्यादा जोर है तो गृहस्थाश्रम में समाज को आगे बढ़ाने के लिए विवाह, संतति निर्माण व उनके समुचित पालन पोषण और साथ ही सामाजिक संबंधों पर विशेष जोर होता है। व्यक्ति के जीवन में राजनीति का पदार्पण भी यहीं होता है। अब तक का सारा वैदिक साहित्य इस बात का साक्षी रहा है कि तब राजनीतिक कार्यों-व्यवहारों के विषय में ब्रह्मचारी और सन्यासी सलाह भले ही देते हों, आम तौर पर वह स्वयं राजनीति से विलग ही रहते थे।

गृहस्थाश्रम के पश्चात आदर्श रूप से वानप्रस्थ आश्रम प्रारंभ होता है जहां व्यक्ति गृहस्थी की मोह माया से पृथक हो या तो प्रकृति संवर्धन में योग देता है या समाज से व्यक्तिगत रूप से विरक्त होकर भी समाज के कल्याण के लिए परामर्शदाता का कार्य करता है।

इहलोक की माया से पृथक हो व्यक्ति अपने परलोक कि संवारने का कार्य जीवन के अंतिम आश्रम – संन्यास आश्रम में करता है। लेकिन वैदिक साहित्य में मनुष्य को बिल्कुल व्यक्तिवादी कभी भी नहीं होने दिया गया है, मानव मात्र के कल्याण के लिए नीति, विधान और आचार संहिता का निर्माण भी इसी आश्रम में लोगों ने किया है।

अब्राहम मैस्लो के आवश्यकता पदानुक्रम/पिरामिड का चरम – आत्म-प्राप्ति (सेल्फ ऐक़चुअलाइजेशन) इसीसे लिया गया लगता है। पता नहीं क्यों, पर यहां ऋषी वात्स्यायन के कामसूत्र की चर्चा समीचीन लगती है जिन्होंने वासना में स्वयं संलिप्त हुए बिना ही वयस्क जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण, सृजनात्मक और आनंददायक क्रिया – काम (सेक्स) के संबंध में अपना विश्व प्रसिद्ध ग्रंथ – कामसूत्र – लिखा जो आज भी सम्बन्धित विषय पर अध्ययन और शोध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार है जिसकी नकल करके, मीमांसा करके या आधार बना कर आज अनेकानेक किताबें लोग लिख रहे हैं, ख्याति अर्जित कर रहे हैं।

वेद, पुराण, ब्राह्मण उपनिषद और शास्त्र, ही हिन्दू धर्म के आधार हैं, जहां धर्म की परिभाषा,”धारयिती ते धर्मः” से कि गई है, अर्थात, जिसे मनुष्य धारण करता है, या जिसने मनुष्य को धारण किया हुआ है। वृहद अर्थों में ज़ाहिर तौर पर यह वह जीवन शैली या पद्धति है जिसे मनुष्य ने धारण किया है या जिसने उसे धारण किया है।

क्षमा चाहूंगा, परंतु वर्तमान के अन्य किसी भी धर्म की तरह हिन्दू (सनातन) धर्म का कोई एक व्यक्ति प्रतिपादक नहीं है। यह सदियों के अनुभव से सीखी गई वह जीवन पद्धति है जिसे आल्प्स पर्वत श्रृंखला से अनेकानेक कारणों से पलायन करके सिंधु घाटी के पास बस जाने वाली मानव संतति ने क्रमश संकलित, संग्रहित, परिशोधित और परिमार्जित किया! और यह सब वे इस कारण कर सके क्योंकि उन्हें धरती के इस भाग पर जीवन यापन के संसाधन जुटाने की जद्दोजहद नहीं करनी पड़ी और वे इस तरह का शोध कर सके जो मानव के कल्याण को समर्पित हो।

इस्लाम और ईसाई धर्म विरोध और हिंसा के गर्भ से पैदा हुआ है इसलिए उनमें असुरक्षा की भावना कूट कूट कर भरी है और इसीलिए वे अन्य धर्मों के प्रति हिंसा और वैर सिखाते हैं। इसीलिए ये दोनों अन्य धर्मालंबियों को धर्मांतरण के लिए येन केन प्रकारेण उकसाते, धमकाते और बहकाते हैं।