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तनावों को सहने के अभ्यास

शीर्षक का पहला शब्द है ‘तनाव’। जाहिर है कि यह दो तरह का हो सकता है: शारीरिक, जो किसी भी क्रिया को करने पर होता है; आप बैठे हैं, लेटे हैं, सोए हैं, आराम कर रहे हैं और कोई काम आ पड़ा, आप उसे करने के लिए उठेंगे तो तनाव होगा। ये दूसरी बात है कि इस तरह की बातों में तनाव कोई भी आम तौर पर महसूस नहीं करता, तब तक जब तक आपको बेमन उठना और कुछ करना न पड़े। अब आपको लघु शंका करनी हो, तो इसके लिए जो आपको उठना और बाथरूम तक जाना पड़ेगा, थोड़े ही न आप इसको तनाव कहेंगे या समझेंगे? लेकिन यदि किसी पड़ोसी ने आपके आराम में खलल डाल दी तो उसके लिए दरवाजा खोलने के लिए उठने को भी आप तनाव की संज्ञा देंगे, (यद्यपि कि तब नहीं यदि उसके साथ या बिना सुंदर सी पड़ोसन दरवाजे पर हो)।

दूसरे तरह का तनाव मानसिक होता है। मानसिक तनाव अनेकों प्रकार के होते हैं। बल्कि ये कहना कि शारीरिक तनाव भी पहले मस्तिष्क में ही उपजते हैं, ज्यादा उचित होगा। आपको कोई आर्थिक समस्या है, आपका मस्तिष्क तनावग्रस्त हो जाता है, कोई रोग, कोई शारीरिक क्लेश, आपको या आपके किसी प्रियजन को हो, तनाव होना अवश्यंभावी! मुहल्ले के किसी असामाजिक तत्व से कोई दिक्कत, तनाव लाजिमी! यानी कि तनाव अनेक और इसके कारण अनेकों!

किसी भी तनाव को हम तब तक सह लेते हैं या कहो कि तनाव कहते ही नहीं है जब तक वह एक खास सीमा नहीं पार कर जाता। यह सीमा विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न होती है। अंग्रेजी में इसे ‘यू- स्ट्रेस’ कहते हैं, हिंदी में ‘असहनीय तनाव’ कह सकते हैं। मतलब वह तनाव जो आपके मन को नहीं भाता। या तो आप उसे करना नहीं चाहते या वह आपके मन को उद्वेलित,दिग्भ्रमित या विक्षिप्त कर देता है। जैसा हमने देखा कि अलग अलग लोगों कि तनाव को सहन करने की क्षमता अलग अलग होती है अतः कोई किसी खास विषय पर तनाव महसूस करता है और कोई इस उससे जरा भी परेशान नहीं होता।

अब इस तरह के तनावों से तो जीवन अटा पड़ा है; हर क्षण, हर कदम पर तनाव है। तो फिर इनसे पार कैसे पाया जाए? हमने देखा कि जिस तनाव को हम सह सकते हैं, वह कोई खास बात होती ही नहीं हमारे लिए, हम उसे तनाव कहते भी नहीं, इसके बारे में सोच कर जरा भी परेशान नहीं होते! पर जब वो सहने की सीमा पार कर जाता है, तो हमारे जीवन में भूचाल आ जाता है; कई लोग तो अपना जीवन समाप्त कर लेने की कोशिश तक कर लेते हैं और सौभाग्यवश यदि असफल हो जाते हैं तो समाज में तिरष्कृत का जीवन जीने को मजबूर होते हैं।

क्या कुछ किया जा सकता है जिससे ऐसी अवस्था ही पैदा ना हो! अथवा, तनाव सहने के लिए व्यक्ति को तैयार करने का कोई ढंग है क्या?

मैं ये जो कुछ लिख रहा हूं, इसका श्रेय जाता है 1992-93 में उत्तर लेई वायु सेना स्टेशन के तत्कालीन मुख्य प्रशासन अफसर विंग कमांडर चौधरी को जिन्होंने ये बात मुझे बताई थी एक तथाकथित सच्ची कहानी के माध्यम से।

उस समय मैं जैसलमेर के वायु सेना स्टेशन के मुख्यालय में तैनात था और स्टेशन कमांडर के निर्देश पर उक्त अफसर से किसी महत्वपूर्ण कार्यवश मिलने उत्तर लेई गया था। साप्ताहिक अवकाश होने के कारण कार्यालय खुले नहीं थे अतः उन्होंने मुझे अपनी बैठक में बिठाया और फोन के जरिए अपने मातहतों से वो कागजात मंगाए जो मेरे कमांडर ने मंगाए थे! इस दौरान साहब ने समय काटने के लिए चाय पीते पिलाते एक कहानी सुनाई जो मुझे जीवन भर नहीं भूलेगी।

उन्होंने एक दूसरे अफसर की कहानी सुनाई जिनकी एक प्यारी सी इकलौती बेटी थी और शुरू से ही इसका लालन पालन उन्होंने इस तरह किया कि वह जिस चीज पर अपनी उंगली रख देती थी वह चीज उसे मिल जाया करती थी! अर्थात उसने कभी भी “नहीं” सुना ही नहीं था! दुर्भाग्यवश, एक दिन उस बच्ची के माता पिता कार दुर्घटना में काल कवलित हो गए उसे नितांत अकेला छोड़कर! उसे किसी नजदीकी रिश्तेदार ने पालने का बीड़ा उठाया। आज तक की सिर्फ “हां” सुनी हुई बच्ची को अब हर वक्त दुनियां की “ना” सुननी पड़ी, वह इस बात से तालमेल नहीं बिठा सकी और चौदह पंद्रह की आयु में ही उसने आत्महत्या कर ली!

कुल मिलाकर निष्कर्ष यह कि बच्चों को शुरू से ही ‘ना’ सुनने की भी आदत डालनी चाहिए! क्योंकि इतना तो तय है कि जीवन में, दुनिया में, हर जगह ‘हां’ तो मिलने से रहा! ज्यादातर नकारात्मकता ही भरी हुई है! अतः, आप कितने भी संपन्न हों, अपने बच्चे को, जो भी वह मांगे, बिना सोचे समझे मात्र इसलिए न दें क्योंकि आप समर्थ हैं! बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए यदि वह चीज जरूरी नहीं है तो बेशक आप उसके लिए ना करें और मजबूती से करें। इसके लिए डांटने–मारने की जरूरत नहीं, क्योंकि वह फिर दूसरी अति हो जाएगी जिससे आगे चलकर बच्चे के व्यक्तित्व का विकास अच्छी तरह नहीं हो पाएगा। सिर्फ आपको अपनी ‘ना’, दृढ़ता से कहनी होगी।

इसे आप चाहें तो व्यक्तित्व को तनावों को सहने के काबिल बनाने के लिए बचपन से ही करवाया गया व्यायाम या अभ्यास कह सकते हैं।