Poems

मर्द जाति से गुहार!

नारी;
मत पूजो इन्हें!

हाड़ मांस की बनी,

बिल्कुल तुम्हारी ही तरह,
चैतन्यता में तुमसे
जरा भी कम नहीं है ये!

क्योंकि नहीं हैं ये मूर्तियां!
मूर्तियों की ही तो करते हो पूजा,
दुर्गा, काली, पार्वती, संतोषी, सीता….?

तुम्हारी
शारीरिक शक्ति में श्रेष्ठता?
अरे पूछ देखो,
अपनी सारी नस्लों से!
कैसी-कैसी आचार-संहिताओं,
स्मृतियों, शास्त्रों व उपनिषदों
की सहायता से,
इन्हें दबाया और मारा गया है!

इन्हें आदमी समझें बस!
अपने बराबर!
काफी होगा!
अपना रास्ता बनाना
आता है इन्हें!!!

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रेल यात्रा


लेख नहीं ये आंखों देखी, औ’ है भुगती बात, रहे संग परिवार के, रेल में हम दो रात!

सहयात्री कटनी में उतर के घर को धाए, अब आए कई बे टिकट औ’ देखें दाएं बांएं!

पहले को तो सच, टी टी ने ही था भेजा , “बस मुगलसराय तक!” कहते आया दूजा!

इनकार कड़क मेरा था दोनों भाग गए, पर नींद तोड़ दी, पूरी रात हम जगे रहे!

ऊपरी कमाई टी टी ने चाही तो क्यों? जल्दी से समृद्ध बनें, आवश्यक ज्यों!

‘जैसी करनी वैसी भरनी’ याद रहे तो कैसे? नंगी आंखें तो उल्टा देखें सारे जग में वैसे!

भ्रष्ट दिखे ना कहीं कष्ट में, मंत्री हो या नेता, फिर टी टी क्यों ना बने भ्रष्ट, क्यों मारा जाए सेंता!

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प्रिय तुम सो जाओ

प्रिय तुम सो जाओ,

ना जगो आस में,

थक गई बहुत हूँ,

यद्यपि हूँ, यहीं पास में!

बाहर का झेला है तुमने,

ब-मुश्किल मैं भी सकी झेल,

ऊपर से पी कर आये हो,

बीवी को क्या समझा है ‘खेल’?

तुमने उतार दी पी कर के,

मैं कहाँ उतारूं, बतलाओ..

भड़ास समूचे दिन भर की,

हो सके मुझे भी समझाओ!

जो आया मन में है तुम्हरे,

उगल कर शांत हो तुम बैठे,

आये ना मुझे मन का कहना,

मेरी चुप्पी समझो तो कैसे?

पूछोगे “प्यार नहीं करती?”

नहीं करती, यदि यही प्यार है!

इसे मैं नाम नहीं दूँगी,

समझते तुम क्या हो,

क्या है ये,

तुम्हारे ही मुंह से बयां हो!

प्यार यदि करते, पूछते हाल हमारा,

दिन भर क्या-क्या किया…

समझते कष्ट हमारा!

सही कहा, झेलते तुम हो बहुत,

क्या समझो क्या-क्या झेला है,

मैनें बनकर बस बुत!

कपडे-लत्ते,चौका-बर्तन,

सब तो मेरे सर पे हैं,

झाडू-पोंछा करती है कामवाली,

पर वो भी बस ऐं–वैं ही है!

भोर जगूं मैं पांच बजे,

पानी आता है उसी वकत,

बर्तन जूठे धोऊंगी कंब,

बतला दो मुझे तुम यही फकत!

बहस में न उलझाओ मुझे,

ना करो रार,

ना जगो आस में,

प्रिय तुम सो जाओ!

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भुनगे

भुनगे से हम,
समझते हैं दुनियां चला रहे!

दुनियां की औकात,
ब्रह्माण्ड के समक्ष,
सब जानते हैं, कुछ भी नहीं!
बड़ा बनने की जुगत में, पर
जोर ये सारा लगा रहे!
बड़ा बनो! कितना बनोगे पर,
सौरमंडल,आकाशगंगा,गैलेक्सी,

संभावना उन पर भी है,
जीवन की!
हम सा ना हो!
गनीमत है,
ये मुग़ालता बना रहे!

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ये बड़े लोग

(बेटा– बेटी के नखरों से प्रभावित एक तुकबंदी, जो उनके बचपन में लिखी थी!)

क्यों मारें हमको पढा पढा?

क्यों चाहें बनाना और बड़ा?

क्या हम बच्चे ही नहीं भले?

क्या इन्हें और कोई नहीं मिले?

क्या खुद ये बच्चे नहीं रहे?

ये बड़े लोग!!

ये देर तलक सोने ना दें।

हर बात में जल्दी किया करें।

खाकर जाओ, लेकर भी जाओ, टिफिन!

हमेशा कहा करें।

हमारी समझें कभी नहीं,

ऊफ! ऊफ! हमेशा किया करें!

ये बड़े लोग!!

ये मस्ती करने कभी ना दें,

खेल कूद से भी रोका करें,

“फ़िल्म सीरियल मत देखो!”

बाहर घर से जाने ना दें,

हर दम पढ़ने को कहा करें,

ये बड़े लोग!!

खुद कहें, “काश होते और पढ़े!”

ये बिना पढ़े जब बने बड़े,

पढ़ लिख कर भी बनते बड़े!

फिर इतनी माथा पच्ची क्यों?

जब सब मिलता है पड़े पड़े!

ये बड़े लोग!!!

फिर पढ़ना कितना कठिन काम,

सर दर्द शुरू होता है राम,

ना काम करे मरहम न बाम,

दर्द – ए – सिर बनते यूं भी आम,

और करें चैन का काम तमाम,

ये सब करते हैं सरे आम!

ये बड़े लोग!!!!!!!

ये बड़े बड़े से नामी जन,

बचपन को जिया है भर भर मन,

लिंकन हो या आइंस्टाइन,

डार्विन हो या चैपलिन,

जे के राउलिंग, मर्लिन मुनरो,

हो जुकरबर्ग, माईकल जॉर्डन,

स्टीफेन किंग या स्टीव जॉब,

चर्चिल हो या एडिसन,

फेल हुए थे सब पहले,

बाद ही जाके किया था ‘कुछ’,

जिन्दगी को जिया ‘ऐज़ इट ईज’,

नंगा दौड़ा आर्केमिडीज़!

खुल कर जीना है बड़ी चीज,

ऐसा ही बोला एलेन पीज!

ऊफ! ऊफ! ऊफ!

सभी ने लिया जीवन को भोग,

ये बड़े लोग!!!!!!!!!

अब छोड़ो भी पीछा करना!

मूंछों को क्यों नीचा करना?

जीने दो हमको खुल के मस्त,

पढ़ा पढ़ा ना करो पस्त!

सोने दो हमको देर तलक,

खाने पर ना झपकाओ पलक!

जीने की है हमने ठानी,

करने दो हमको मनमानी,

हम करेंगे ना कोई गलत काम,

तुम्हें करेंगे नहीं बदनाम,

नीयत हमारी भांपो तुम,

मन के अंदर झांको तुम,

थोड़ी आजादी तो दे दो,

ओ बड़े लोग!!!!!!!!!!

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डोर (2001 में रचित)

बचपन की बातें…..,
खेल खेल में बीते सारे दिन,
सपनों में बीतीं, सारी सारी रातें!

बड़ी हुई तो…
ख्वाबों ने अंगड़ाई ली,
वो जागते के ख्वाब,
वो सोते के सपने,
ख्वाबों की वो दुनियां,…
सपनों की वो परी प्यारी,
सारे जहां से थी न्यारी!

हवाओं से हल्की हो,
बिना डोर के पतंग बन,
उड़ती थी मैं……
निर्बंध नदी बन
बहती थी मैं!

लेकिन,
अब आया समझ में,
कैसे अटपटे थे मेरे सपने,
हवाओं से हल्की और,
बिना बांध की नदी,
क्या बन सकता है कोई?

वो सारे ख्वाब,
वो सारे सपने,
कैसे बेमानी थे भला!
बिना डोर के पतंग,
हो सकती है क्या?

और,
डोर हो तो,
‘आजादी’,
बेमानी नहीं तो, और क्या!!!!

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पत्नी के फायदे (2001 में रचित) 

(कविता, तुकबंदी जो भी बन पाई है यह, इसके बनने की कहानी दिलचस्प है! चेन्नई के आवडी स्थित एम टी टी आई के हिन्दी पत्रिका ‘परिवाहिका’ का प्रथम अंक छपना था, प्रशिक्षुओं की प्रविष्टियों से बात नहीं बन रही थी तो कुछ बेहतर चाहिए था, मुझे एक दिन का समय दिया गया दो पृष्ठ की सामग्री देने के लिए। और इस तरह अस्तित्व में आई यह और ‘डोर’ जो वस्तुतः मेरी पत्नी किरण द्वारा रचित है। मेरे नाम के वेबसाइट पर उसे प्रकाशित करने की वाजिब वजह है, पर वह बाद में कभी!)

पत्नी के फायदे?, अरे ढेरों हैं श्रीमान,
इक बहु-उपयोगी चीज़ कि जिसका कोई नहीं गुमान!
कोई नहीं गुमान, कि अरे जनाबे आली,
सुबह, दोपहर, शाम औे रात परोसे थाली!
सेवा करे पति की हर तरह, बने सेविका,
बिन उपहार मनुहार, रहे स्थाई प्रेमिका!
कपड़े लत्ते, चौका बर्तन, या हो झाड़ू पोंछा,
बनी रहे मुस्तैद सदा क्या कभी ये हमने सोचा?
कभी ना सोचा, व्यस्त रहे वो चौबीस घंटे,
सपने में भी निपटाए बच्चों के टंटे!
रुपये कमायें भले आप, हिसाब तो वो ही रक्खे,
बिना खिलाएं आप सभी को, स्वयं न कुछ भी चक्खे!
हर दिन ड्यूटी करे, वो छुट्टी कभी ना पाए,
सुने हमेशा पति की, भले वो फूटी आंख ना भाए!

इसलिए,
मानिए बात हमारी, कीजै अब पत्नी पूजा,
क्योंकि इतना आनंद ना देवे कोई दूजा!

अंततः,
कहें अजय कविराय, बनो ना हड्डी, बनो कबाब,
फायदे बहुत हैं पत्नी के, क्या समझे आप जनाब?!!!