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अंग्रेजी बनाम हिंदी

किसी भी समाज की भाषा उसकी गरिमा और सांस्कृतिक पहचान की वाहिका भी होती है और उसकी कसौटी भी। परिवर्तन का माध्यम वही भाषा बन सकती है जो जनता की अपनी है, विशेषकर आज के लोकतान्त्रिक युग में। शक्तिवानों व उच्च वर्ग की भाषा (हमारे देश में अंग्रेजी) के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिवर्तन की चाह करना आसमान के तारे तोड़ लाने जैसा है।

भारतीय भाषाएं पीछे छूट गई हैं, क्योंकि आर्थिक जीवन में आज अंग्रेजी महत्वपूर्ण है। अपनी-अपनी मातृभाषा में शिक्षित नौजवानों को एक तो नौकरी मिलती नहीं, और अगर मिल भी जाती है तो अंग्रेजी में उनकी कमजोरी उन्हें पदोन्नत्ति की होड़ में पीछे छोड़ देती है। असफल होने की यह जो गांठ पड़ गई है उनके दिलों में, कि वे यह समझने लगे हैं कि अपनी मातृभाषा में लोक-व्यवहार करने से उनकी प्रतिष्ठा घट जाएगी और उन्हें पिछड़ा माना जाएगा। इसीलिए तो हिंदी दिवस पर मंचों से हिंदी  का गुणगान करने वाले भी व्यवहार में अंग्रेजी के आगे अपना शीश नवाते हैं,अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों-महाविद्यालयों व् संस्थानों में ही पढ़ाते हैं, खुद भी बातचीत करने में भले ही अच्छी न हो, शुद्ध न हो, अंग्रेजी का प्रयोग करके गर्व का अनुभव करते हैं।  

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अनेक योजनायें ,समितियां- उपसमितियां,पद आदि बने हैं, विभिन्न स्तर के दौरे होते हैं, खूब पैसा खर्च किया जाता है। पर इन सबका मकसद यही रहा है कि अंग्रेजी शंब्दों के समानार्थी हिंदी शब्द गढ़े जाएं और सरकारी कामों में उनका उपयोग किया जाय। इक्के-दुक्के को छोड़ कर सारे राजभाषा अधिकारी अनुवाद की जहमत उठाने को मजबूर हैं और उनके बच्चे भी शिक्षा के माध्यम के रूप में अंग्रेजी को ही चुनते हैं।

हिंदी को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उसे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में अंग्रेजी का स्थानापन्न बनना है, उसके साथ न सिर्फ दौड़ना है बल्कि उससे आगे निकलना है। उसे मौलिक रचनात्मकता की ताकत भी बनाए रखनी है। यानी आज की जोखिमों और अपनी समृद्ध विरासत का सृजनात्मक समन्वयन करना है। साथ ही उसे हिन्दी-भाषी समुदाय को अंग्रेजी के आतंक से मुक्त भी कराना है। इससे भी बढ़कर इसे उन हिन्दी के अंधभक्तों का भी सामना करना है जो यक-ब-यक इसे राष्ट्रभाषा बनाने और सिर्फ तत्सम व तद्भव शब्दों के प्रयोग का आग्रह रखते हैं। उर्दू तथा अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को वे विजातीय मानते हैं, विदेशी शब्दों की तो बात ही छोड़ दें। पर भारतीय संस्कृति की सामासिकता और हमारे एक बहुभाषी राष्ट्र होने के तथ्य को कैसे भुलाया जा सकता है। हिन्दी चाहे कितनी भी वैज्ञानिक भाषा हो, सीखने में चाहे कितनी भी सरल क्यों न हो, हिंदीतर मातृभाषाओं का स्थान भला कैसे ले सकती है? इसलिए, उचित तो यही होगा कि यह पहले देश की संपर्क-भाषा बने और तब धीरे-धीरे यदि समस्त भारतीय स्वीकार करें, राष्ट्रभाषा बनने के मार्ग पर प्रशस्त हो। समस्त भारतीयों द्वारा इसको स्वीकार्य बनाने के लिए हमें हिन्दी-भाषी प्रदेशों में हिंदीतर भाषाओं की पढ़ाई अनिवार्य करनी होगी!

स्थिति लेकिन विपरीत है। अंग्रेजी ने भारतीय कुलीन वर्ग को कमोबेश अपना गुलाम बना रखा है। अंग्रेजों के राज के खत्म होने के 74 सालों के बाद भी भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में अंग्रेजी का राज बदस्तूर जारी है। यह पहले तो दफ्तरों और उच्च शैक्षिक संस्थाओं तक ही सीमित थी पर अब इसने रसोईघरों तक में घुसपैठ कर ली है। आज अंग्रेजी जानने वालों का प्रतिशत भी 1947 से कहीं ज्यादा है। फिर भी, यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत गांवों का देश है, और आज भी हमारे अधिकतर देशवासियों के लिए अंग्रेजी एक अनजानी और परायी भाषा है। वे सामान्यतः भारतीय भाषाओं में ही संस्कारित भी होते हैं और खुद को अभिव्यक्त भी करते हैं। महानगरों और मंझोले शहरों में अंग्रेजी की चौंध के बावजूद देश के देहातों और कस्बों में झिलमिलाते भारतीय भाषाओं के दीपों को दीप-माला का रुप देने की जरुरत है, जो हमारे मन से अंग्रेजी के सांस्कृतिक व बौद्धिक साम्राज्यवाद के अंधेरे को खतम करे, हमें आत्मगौरव के भाव से रोशन करे।