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फेसबुकिया पसंदगी- नापसंदगी

जब किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थान से आपका परिचय होता है, एक सम्बन्ध बनता है, तो आपके मन में उसकी एक छाप बनती है, एक तस्वीर बनती है। तो आप जब यह कहते हैं कि आप उसे पसंद या नापसंद करते हैं, ज्यादा करें, कम करें, ये दीगर बात है, तो थोडा सोच के देखें, आप किसे पसंद या नापसंद करते हैं, उस वस्तु, व्यक्ति, या स्थान को या आपके मन में बनी उसकी तस्वीर को ? जाहिर है, उसकी तस्वीर को।

फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों पर हुआ परिचय, मित्रता या संपर्क तो पहले ही वर्चुअल या आभासी होता है। सबसे पहले तो आपकी प्रदर्शित छवि (display picture-DP) पर राय बनाई जाती है फिर बारी आती है आपके पोस्ट की-लेख, कविता, कहानियों की। बात वहीं खत्म हो जाती तो भी कोई बात नहीं थी, लेकिन फिर शुरु होता है संवाद-प्रतिसंवाद, आपके पोस्ट पर टिप्पणियाँ की जातीं हैं, आपके द्वारा और आपके मित्रों द्वारा प्रति-टिप्पणियाँ की जाती हैं, उन टिप्पणियों और प्रतिटिप्पणियों पर भी टिप्पणियाँ होती हैं और क्रम चलता रहता है, कभी थोड़े तो कभी लंबे अरसे तक। यह कभी तो शालीनता के स्वीकृत मानकों के अनुरुप होते हैं पर कभी-कभी इस सामाजिक आवश्यकता को दरकिनार कर दिया जाता है और तब यह संवाद थुक्कम-फजीहत बन जाता है। इतना होने के बावजूद कभी तो यह सब शालीनता का लबादा ओढ़े होता है, कभी उसे उतार फेंकता है। शालीन उत्तरों में भी आप अपना अहम्, अपनी पूर्वधारणाएं, अपनी हीन भावना या उच्चता की भावना आदि उगलते हैं, गैर शालीन उत्तरों के बारे में बताने की जरुरत नहीं, क्योंकि उनमें बिना किसी रोक- टोक के शील-अश्लील सारे भड़ास निकले जाते हैं। अब यह तो सब मानेंगे कि हम बाहर से चाहे कितने ही शालीन, उच्च पदस्थ, प्रतिष्ठित हों, हमारे अंतर के एक कमरे में पशु वृत्तियां भरी हैं। और कोई भी प्रतिक्रिया करते समय उसमें से इन्हें अलग-थलग रख पाना सबके लिए आसान नहीं होता।

और तब निर्मित होती है अंतिम(?) पसंदगी-नापसंदगी! तब बनती है अंतिम(?) राय! और किसी के व्यक्तित्व के संबंध में राय जब एक बार बन जाती है तो बदलती जरा देर से है।

सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे पोस्ट भी मिलते हैं जिनमें विद्वता तो भरी होती है पर उस पर होने वाली टिप्पणियों में किसी या कुछ की पसंदगी-नापसंदगी नहीं होने का विलाप सा किया जाता प्रतीत होता है, पोस्ट भेजने वाले विद्वान द्वारा भी और उनके मित्रों द्वारा भी। कुछ के फेसबुकिया मित्रों ने तो अपने सम्मानित सामाजिक स्थानों की परवाह छोड़कर चाटुकारिता की हदें पार कर रखी हैं, तो ऐसे मित्रों के कमेंट्स ज्यादा ही आते हैं, और ऐसे-ऐसे कि दुर्बल हृदय वाला हृदयाघात से मर जाए यदि समझ ले कि यह सब उसी को इंगित है। अब भई, किसी की खास कोई राय बन गई होगी आपके बारे में! समझ तो गए ही होंगे आप! क्यों!

आप सबकी प्रतिक्रियाएं आमंत्रित हैं बुरी-भली-भदेस कैसी भी!

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