काम पूजा है; पूजा काम नहीं

हम हिन्दुस्तानी, चाहे हिंदू हों, मुस्लिम, सिक्ख या पारसी- दुनिया के किसी भी देश के लोगों से ज्यादा समय धार्मिक कर्मकांडों में बिताते हैं। “सात वार और नौ त्यौहार” कहावत ऐसे ही थोड़ा ही न है! धार्मिक अवकाश (घोषित) के दिन, रोज के प्रार्थना/नमाज़/अरदास आदि, सत्संग, प्रवचन, कीर्तन- भजन आदि मैं बिताए घंटे, इन सबका योग किसीको भी दंग करने के लिए काफी है-करोड़ों मानव-घंटों की (आपराधिक) बर्बादी! क्या हमारी तरह का एक गरीब विकासशील देश इतने करोड़ों घंटों का नुक़सान ऐसे कार्यों में कर सकता है जिनसे कोई वास्तविक या कहिए आर्थिक लाभ न हो।

हमें खुद से यह भी पूछना चाहिए कि क्या प्रार्थनाओं और अन्य धार्मिक कर्मकांडों का कड़ाई से पालन करने वाले लोग बड़े पवित्र और भले मानस हो जाते हैं? और क्या यह सच नहीं है कि चोर-डकैत भी अपने अभियानों पर निकलने से पहले अपनी सफलता के लिए इन्हीं देवताओं से प्रार्थना करते हैं? क्या बड़े से बड़ा कर-चोर और कालाबाजारी सबसे ज्यादा धार्मिक होने का ढोंग नहीं करता? सबसे ज्यादा कुकर्म करने वाले ही ईश्वर के सामने सबसे ज्यादा नाक रगड़ते हैं-दरअसल वे अपने पापों व कुकर्मों की माफी मांग रहे होते हैं।

सबसे बड़ी बात कि यह पूजा होती क्या है? “हे ईश्वर, नौकरी लग जाए तो सोलह सोमवार जल चढ़ाऊंगा!”, “इस बार बेटा हुआ तो सवा सौ/हजार/लाख (क्षमता अनुसार) का चढ़ावा चढ़ाऊंगा!” या कि चंदन, सिंदूर, बेलपत्र…… क्या सृष्टिकर्ता इन बातों की अपेक्षा करता होगा अपनी सृष्टि के सबसे विलक्षण जीवधारियों(मनुष्यों) से? समस्त ब्रह्मांड के रचयिता और पालनकर्ता के साथ हम भला किस मूर्खतापूर्ण व्यापार को करने का पाखंड करते हैं? इन शर्तों पर तो कोई बेवकूफ भी आपके साथ कोई व्यापारिक डील न करें, वह तो भगवान है! और क्या हम जानते नहीं कि जो चादरें हजारों पर चढ़ाई जाती हैं, जो मिठाइयां मंदिरों में चढ़ाई जाती हैं, उनका क्या हस्र होता है? वे फिर उन्हीं दुकानों में पहुंचती हैं जहां से खरीद कर लाई जाती हैं!

कोई व्यक्ति कैसे अपना समय व्यतीत करता है, यह पूरी तरह उसका निर्णय है, पर उसे कोई अधिकार नहीं कि वह अपनी धार्मिकता दुसरों पर थोपे! हम बिना अपने सह-नागरिकों की भावनाओं और चैनों-आराम का ख्याल किए बिना ऐसा करते हैं। इसका एक सटीक उदाहरण है लाउडस्पीकरों का प्रयोग- चाहे वह प्रार्थना के लिए हो, कीर्तन, अजान या जागरण के लिए! पूरी रात के जागरण में तो हम हद ही पार कर देते हैं-पूरी की पूरी बस्ती या इलाके की नींद कर लाभ करते हैं, बिना इस बात की परवाह कि उन्हें यह पसंद है भी या नहीं। दूसरा उदाहरण है भीड़ भरी गलियों से धार्मिक जूलूस निकालना, जो पूरी रिहाईस की शांति-व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देते हैं! यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदू-मुस्लिम दंगों के सर्वाधिक प्रत्यक्ष कारणों में हिन्दुओं के धार्मिक जूलूस का मस्जिदों के बगल से तब गुजरना जब नमाज़ घर रही हो, या हिंदू मंदिरों के बगल से ताजियों का गुजरना पाया गया है!

यदि हर मद को आबंटित समय की तुलना करें तो हमारे देश में इलेक्ट्रोनिक मीडिया का सबसे ज्यादा समय धार्मिक प्रसारणों में जाता है।

ध्यान: एक नया फैड
हमारे अर्द्ध शिक्षितों में, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष लोगों में, आजकल एक नई बना या झलक देखने को मिलती है-ध्यान (मेडिटेशन) की-पद्मासन में बैठ अपनी श्वास-प्रश्वास को व्यवस्थित और नियंत्रित करना और अंततः दिमाग को रिक्त करना। उच्चतर लक्ष्य होता है मेरुदंड के आधार में सर्प की मानिंद कुण्डली मार के बैठी ‘कुंडलिनी’ को जगाना। जब यह पूरी तरह जंग जाती है, तो समझा जाता है कि व्यक्ति ने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। इससे प्राप्त क्या होता है? – मस्तिष्क की शांति! अब यदि पूछा जाए कि मस्तिष्क की शांति से क्या होता है? तो कोई उत्तर नहीं!

‘मस्तिष्क की शांति’ एक नपुंसक अवधारणा है जो नितांत अनुत्पादक है। इस ध्यान के व्यायाम को उच्च रक्तचाप या मानसिक रोगी से ग्रसित व्यक्ति की चिकित्सा का साधन बनाया जाए तो कोई आपत्ति नहीं-परंतु एक स्वस्थ व्यक्ति में यह रचनात्मकता या उत्पादकता बढ़ाता हो-ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है। इसके विपरीत कई दृष्टांत मिल जाएंगे कि सारे श्रेष्ठ कार्य-चाहे कला के क्षेत्र में हों, साहित्य, विज्ञान या संगीत के क्षेत्र में, सभी सर्वाधिक अशांत वह आंदोलित मस्तिष्कों द्वारा सृजित हैं।

निष्कर्ष रुप में, “काम पूजा है, पूजा काम नहीं!”

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