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मिटाओ न खुद को अपनों पर

मानो न हार,

करती रहो गुहार!

सपने सपने हैं,

मेरे हों कि तुम्हारे!

मजबूत बनने की,

या कि,

दुनिया में कुछ फर्क लाने की,

अपना वजूद साबित करने की,

या कि,

खुदमुख्तार बनने की!

उम्र के उस,

रंगीन मुकाम पर आकर,

तुम्हारे सपनों में आता है,

पता नहीं कहां से,

एक राजकुमार!

स्वाभाविक है यह संबंध,

जरूरी है यह सम–बंध,

जहां दो समान बंधें आपस में,

व्यक्ति को पूरा होने के लिए!

पर होता इसका उल्टा है,

संबंध बंधन बन जाते हैं,

सम– बंध नहीं रहते,

बंधते तो हैं, पर

समानता गुम जाती है!

शादी, बच्चे, बच्चों की शादी,

फिर उनके बच्चे…., और बस!

खत्म हो जाती है,

तुम्हारे सपनों की दौड़!

पर,

खतरनाक है यह मोड़,

जहां तुम्हारा ‘मैं’ खो जाता है,

तुम हो जाती हो,

दूसरों के लिए,

जिन्हें तुम अपना कहती हो,

रहती हो मुगालते में,

‘अपनों’ के लिए कुर्बानी के,

मिट जाती हो तुम,

हो जाती हो–बिल्कुल खत्म!

या मैं–पुरुष, समझाता हूं,

मनाता हूं,

ललचाता हूं,

आराम के साधन भरता हूं,

घर में,

ताकि तुम चांदी की कटोरी से,

पानी पियो और,

सोने के पिंजड़े में,

आराम से रहो और,

भूल जाओ,

निर्बंध नदी जैसी,

बिना डोर के पतंग जैसी

सपनों की अपनी उड़ान को,

और, इस बंधन को ही,

अपनी नियति मान लो!

तुम ऐसा ही,

करती भी ही,

बिना सोचे, समझे,

बिना जाने,

कि ऐसा कर के,

आधा कर देती हो,

विकाश की उस गति को,

जो दूनी होती यदि,

तुम्हारे सपने भी जिंदा रहते!

दरअसल, तुम जिंदा रहतीं उनमें,

पर, अब कहता हूं,

आधी तुम हो, आधा मैं,

न मानो बनूं यदि बाधा मैं,

परवान करो तुम सपनों पर,

मिटाओ ना खुद को अपनों पर!

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